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शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

भ्रष्टाचार व लोकपाल के भंवर में फंसा भारतीय लोकतंत्र


अन्ना के आन्दोलन से एक बात देश का हर नागरिक स्पष्ट रूप से जान गया कि भारतीय संविधान में प्रधानमंत्री एक ऐसा अघोषित पद बना दिया गया है कि उस (पीएम) पर, पद पर बने रहते आरोप लगाया जा सकता है, उंगली उठाई जा सकती है, परन्तु जांच नहीं की जा सकती। जन-जन को लोकपाल से परिचित कराने के लिए अण्णा को कोटि-कोटि साधुवाद। एक ईमानदार व सच्चे इंसान (पीएम मनमोहन सिंह) की जांच से लोकतंत्र के अस्थिर होने की बात गले के नीचे नहीं उतरती।


बुधवार, 17 अगस्त 2011

क्या गांधी को भी अनशन करने से रोकती सरकार?


यदि महात्मा गांधी जिंदा होते और कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करते, तो क्या सरकार उनके साथ भी ऐसा ही करती जैसा अण्णा हजारे के साथ किया गया। बेशक कर सकती थी क्योंकि यह कांग्रेस लाल, बाल, पाल, गांधी, सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत की कांग्रेस नहीं है, बल्कि नेहरु खानदान की जागीर है। यदि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लाल, बाल, पाल, गांधी, सरदार पटेल या गोविन्द वल्लभ पंत जैसे कांग्रेसी भी अनशन करने की जुर्रत करते तो सरकार उनसे अंग्रेज सरकार से भी बदतर तरीके से निपटती।